Saturday, December 10, 2016

राव चन्द्रसेन मारवाड़ के भूले हुये नायक राव चंद्रसेन

राव चंद्रसेन
राव चंद्रसेन को मुगलकाल का मारवाड़ का महान सैनानी कहा गया है ।राव चंद्रसेन मारवाड़ (जोधपुर) के मालदेव के पुत्र थे ।इनको अपने भाइयों -उदय सिंह और राम के साथ उत्तराधिकार का युद्ध लड़ना पड़ा ।राव चंद्रसेन को अपने शासन के लगभग 19 वर्ष तक अपनी मातृ भूमि की आजादी के लिए जूझते और ठोकर खाते रहे और अंत में देश की आजादी के लिए ही उन्होंने अपने प्राण भी गंवा दिए ।दुर्भाग्यवश ,चंद्रसेन सम्बन्धी ऐतिहासिक सामग्री को छिपाये जाने के फलस्वरूप चंद्रसेन का व्यक्तित्व प्रकाश में नहीं आ पाया ,लेकिन आधुनिक अनुसंधानों ने आखिर इस विस्मर्त सेनानी को सामने ला ही दिया ।इसी लिए अनेक इतिहासकार चंद्रसेन को मारवाड़ का भुला हुआ नायक भी कहते है ।
जन्मराव चन्द्रसेन का जन्म विक्रम संवत 1598 श्रावण शुक्लाअष्टमी (30 जुलाई, 1541 ई.) को हुआ था।

भाइयों का विद्रोह---

राव मालदेव ने अपने जीवन काल में ही चंद्रसेन के बड़े भाइयों --राम सिंह और उदय सिंह को उत्तराधिकार से वंचित करके चंद्रसेन को अपना उत्तराधिकारी बना कर जोधपुर में गृहयुद्ध के बीज बो दिए थे ।राव चंद्रसेन स्वाभिमानी और वीर योद्धा थे ।वे जोधपुर की गद्दी पर बैठते ही इनके बड़े भाइयों राम और उदयसिंह ने राजगद्दी के लिए विद्रोह कर दिया। मारवाड़ के बहुत से राजपूत सरदारों ने इन तीनों विद्रोही भाइयों को अपने अपने तरीके से सहायता दी ।चंद्रसेन भाइयों के विद्रोह को तो दवाने में सफल रहे लेकिन असंतुस्ट भाई चंद्रसेन से बदला लेने के लिए अवसर और सहारे की तलाश में रहे ।चंद्रसेन के दोनों भाईयों ने उनके विरुद्ध अकबर के दरबार में सहायता की प्रार्थना के लिए जा पहुंचे ।वास्तव में चंद्रसेन के दोनों भाइयों ने मुगलों के साथ गठबंधन कर लिया ।

सम्राट अकबर की नीति ही यही थी कि राजपूतों की फुट से पूरा पूरा राजनितिक लाभ उठाया जाय ।अकबर नेचंद्रसेन और उनके भाइयों की फूट का लाभ लेने के लिए नागौर के मुग़ल हाकिम हुसैन कुलीबेग को सेना देकर 1564 में जोधपुर पर आक्रमण कर दिया जिसमें चंद्रसेन के भाई भी सामिल थे ।चंद्रसेन को जोधपुर का किला खाली करके भाद्राजून चला जाना पड़ा ।


मुग़लों से संघर्ष---

राव चंद्रसेन
जोधपुर छूटने के बाद साधन हीन चंद्रसेन की आर्थिक स्थिति निरंतर बिगड़ती गई ।परिस्थितियों वश चंद्रसेन ने यह उचित समझा कि समझा कि अकबर के साथ सन्धि कर ली जाय ।सन् 1570 ई0को बादशाह अकबर जियारत करनेअजमेर आया वहां से वह नागौर पहुंचा, जहाँ सभी राजपूतराजा उससे मिलने पहुंचे। राव चन्द्रसेन भी नागौर पहुंचा, पर वह अकबर की फूट डालो नीति देखकर वापस लौट आया। उस वक्त उसका सहोदर उदयसिंह भी वहां उपस्थित था, जिसे अकबर ने जोधपुर के शासक के तौर पर मान्यता दे दी। कुछ समय पश्चात मुग़ल सेना ने भाद्राजूण पर आक्रमण कर दिया, पर राव चन्द्रसेन वहां से सिवाना के लिए निकल गए। सिवाना से ही राव चन्द्रसेन ने मुग़ल क्षेत्रों, अजमेर, जैतारण,जोधपुर आदि पर छापामार हमले शुरू कर दिए। राव चन्द्रसेन ने दुर्ग में रहकर रक्षात्मक युद्ध करने के बजाय पहाड़ों में जाकर छापामार युद्ध प्रणाली अपनाई। अपने कुछ विश्वस्त साथियों को क़िले में छोड़कर खुद पिपलोद के पहाड़ों में चले गए और वहीं से मुग़ल सेना पर आक्रमण करके उनकी रसद सामग्री आदि को लूट लेते। बादशाह अकबर ने उनके विरुद्ध कई बार बड़ी सेनाएं भेजीं, पर अपनी छापामार युद्ध नीति के बल पर राव चन्द्रसेन अपने थोड़े से सैनिको के दम पर ही मुग़ल सेना पर भारी रहे।2 वर्ष तक युद्ध होता रहा और राठौड़ों ने ऐसा सामना किया की जनवरी 1575 ई0 में आगरा से और सेना भेजनी पडी ।परन्तु इस बार भी मुगलों को सफलता नहीं मिली जिसके कारण अकबर बड़ा नाराज हुआ ।इसके बाद जलाल खान के नेतृत्व में सेना भेजी परन्तु जलाल खान स्वयं मार डाला गया ।चौथी बार अकबर ने शाहबाज खां को भेजा जिसने 1576 ई0 में अंततः सिवाना दुर्ग पर अधिकार कर लिया ।

1576 -77 ई0में सिवाना पर मुग़ल सेना के आधिपत्य के बाद राव चन्द्रसेन मेवाड़, सिरोही, डूंगरपुर और बांसवाड़ा आदि स्थानों पर रहने लगे लेकिन मुग़ल सेना उनका बराबर पीछा कर रही थी । सन् 1579ई0 में चंद्रसेन ने अजमेर के पहाड़ों से निकल कर सोजत के पास सरवाड़ के थाने से मुगलों को खदेड़ दिया और स्वयं सारण पर्वत क्षेत्र में जारहे ।उसी क्षेत्र में सचियाव गांव में 1580ई0 में उनका देहांत हो गया । अकबर उदयसिंह के पक्ष में था, फिर भी उदयसिंह राव चन्द्रसेन के रहते जोधपुर का राजा बनने के बावजूद भी मारवाड़ का एकछत्र शासक नहीं बन सका। अकबर ने बहुत कोशिश की कि राव चन्द्रसेन उसकी अधीनता स्वीकार कर ले, पर स्वतंत्र प्रवृति वाला राव चन्द्रसेन अकबर के मुकाबले कम साधन होने के बावजूद अपने जीवन में अकबर के आगे झुके नहीं और विद्रोह जारी रखा।चंद्रसेन और प्रताप की एक दूसरे से तुलना करना तो कठिन है ,लेकिन यह अवश्य सत्य है कि चंद्रसेन राजपूताने के उन शक्तिशाली राजाओं में से एक थे जिसने अकबर को लोहे के चने चबा दिए थे ।डिंगल काव्य में चंद्रसेन को श्रद्धान्जली इस प्रकार दी गई ---

अंडगिया तुरी ऊजला असमर
चाकर रहन न दिगीया चीत
सारै हिन्दुस्थान तना सिर
पातळ नै चंद्रसेन प्रवीत

अर्थात ---जिनके घोड़ों को शाही दाग नहीं लगा ,जो उज्जवल रहे शाही चाकरी के लिए जिनका चित्त नहीं डिगा ,ऐसे सारे भारत के शीर्ष थे राणा प्रताप और राव चंद्रसेन ।मैं ऐसे भूले विसरे नायक अदम्य साहसी योद्धा को सत् सत् नमन करता हूँ ।जय हिन्द ।जय राजपूताना ।।


लेखक --डा0 धीरेन्द्र सिंह जादौन
मिडिया प्रभारी नार्थ इण्डिया
अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा (अध्यक्ष राजा दिग्विजय सिंह जी वांकानेर)

Monday, December 5, 2016

शेर सिंह राणा

शेर सिंह राणा
शेर सिंह राणा उर्फ़ पंकज सिंह (जन्म:17 मई 1976) डकैत से सांसद बनी फूलन देवी की हत्या की थी। शेर सिंह राणा का जन्म 17 मई 1976 को उत्तराखंड के रुड़की में हुआ था।


फूलन देवी की हत्या


25 जुलाई 2001 को दिल्ली स्थित सरकारी आवास के सामने फूलन देवी की गोलियों से भूनकर हत्या कर दी गई। इस घटना के दो दिन बाद आरोपी शेर सिंह राणा ने देहरादून में पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और हत्या में शामिल होने की बाद स्वीकार कर ली। इस हत्या को अंजाम देने का जो कारण सामने आया वह चौंकाने वाला था। पुलिस के अनुसार राणा ने बहमई हत्याकांड में मारे गए 22 ठाकुरों की हत्या का बदला लेने के लिए फूलन देवी की हत्या की।


जेल से फरार

लगभग तीन साल बाद 17 फ़रवरी 2004 को राणा फिल्मी अंदाज में तिहाड़ जेल से फरार हो गये। तिहाड़ जैसी अतिसुरक्षित जेल से किसी कैदी का फरार हो जाना अपने आप में बड़ी बात थी। इसलिए राणा एकाएक फिर सुर्खियों में आ गये। लेकिन 17 मई 2006 को राणा को एक बार फिर कोलकाता के एक गेस्ट हाउस से गिरफ्तार कर लिया गया।


अफगानिस्तान से पृथ्वीराज चौहान की अस्थियाँ लाये

शेर सिंह राणा
अपने फरारी के दिनों के बारे में राणा ने जो खुलासा किया वह आश्चर्यजनक था। राणा ने दावा किया कि अफगानिस्तान के गजनी इलाके में हिन्दूसम्राट पृथ्वीराज चौहान की रखी अस्थियों के अपमान की जानकारी मिलने को लेकर वह बेहद दुखी थे और उन्होने उसे वापस लाने की ठानी। फरारी के बाद उन्होने सबसे पहले रांची से फर्जी पासपोर्ट बनवाया। नेपालबांग्लादेशदुबई होते हुए अफगानिस्तान पहुंचे। जान जोखिम में डालते 2005 में वह अस्थियां लेकर भारत आये। राणा ने पूरे घटनाक्रम की वीडियो भी बनाई। ताकि वह अपनी बात को प्रमाणित कर सके। बाद में राणा ने अपनी मां की मदद से गाजियाबाद के पिलखुआ में पृथ्वीराज चौहान का मंदिर बनवाया, जहां पर उनकी अस्थियां रखी गई।


2012 विधानसभा चुनाव

शेर सिंह राणा
शेर सिंह राणा ने 2012 में उत्तर प्रदेश के जेवर से निर्दलीय चुनाव भी लड़ा लेकिन हार गये। वह पांचवें नंबर पर आये थे। यह चुनाव क्षेत्र जातीय समीरकरण के हिसाब से ठाकुर बाहुल्य है।

राणा पर फिल्म

"एंड ऑफ़ बैंडिट क्वीन" नामक फिल्म शेर सिंह राणा के जीवन पर आधारित हैं, जिसमे शेर सिंह राणा का किरदार अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्धिकी ने निभाया हैं।



Sunday, December 4, 2016

पृथ्वीराज चौहान

पृथ्वीराज चौहान
दिल्लीपति महाराज अनंगपाल अपने विशाल कक्ष में गंभीरता की प्रतिमूर्ति बने बैठे हुए थे। यद्यपि उनके सामने ही राज्य के प्रमुख सलाहकार नीतिकार मंत्री चंद्रसेन भी उपस्थित थे, तथापि कक्ष में पूरी तरह सन्नाटे का साम्राज्य स्थापित था।

‘‘चंद्र !’’ महाराज अनंगपाल सन्नाटे का साम्राज्य भंग करते हुए गंभीरता से बोले, ‘‘आज हमें ऐसा प्रतीत होने लगा है कि दिल्ली का सिंहासन उत्तराधिकार विहीन होने जा रहा है।’’

‘‘महाराज !’’ चंद्रसेन धीरे से बोला, ‘‘इतना निराश न होइए। विधाता की महिमा अपरंपार है। वे निराशाओं में भी आशा के फूल खिला देते हैं। विषाद को हर्ष में और शोक को प्रसन्नता में बदल देने की उनमें अद्भुत क्षमता है। आप धैर्य धारण करें।’’

‘‘धैर्य का और हमारा बहुत लंबा साथ रहा है चंद्र ! किंतु अब धैर्य चुकने लगा है और...और अब से राजकुमारी कर्पूरी राजमहल से विदा होकर अजमेर गई हैं, तब से ऐसा लगता है कि राजमहल ही नहीं, सारी दिल्ली सूनी हो गई है।’’

‘‘महाराज ! अपनी संतानों में पुत्री एक ऐसा रत्न होती है, जिसे प्रसन्नता के साथ अन्य पुरुष को समर्पित करना ही पड़ता है। पुत्री से अधिक अपेक्षा करना उचित नहीं होता महाराज !’’
पृथ्वीराज चौहान
‘‘तुम ठीक कहते हो चंद्र ! लेकिन पुत्री से उपेक्षा भी तो नहीं की जा सकती और वह पुत्री यदि अपने पिता की एकलौती संतान हो तो पिता की सारी क्रिया-प्रतिक्रिया अपनी पुत्री के इर्द-गिर्द ही विचरण करके दम तोड़ने लगती है। ऐसी स्थिति में एक पिता अपनी पुत्री से कोई अपेक्षा ही न रखे तो और क्या करे ?’’

‘‘महाराज ! जब यह निश्चित है कि पुत्री को एक दिन विदा ही करना है, तब पुत्री से अपेक्षा रखकर किया भी क्या जा सकता है ?’’

चंद्रसेन दिल्ली के राजा अनंगपाल को समझाते हुए बोला, ‘‘केवल यही कि संयम से काम लिया जाए।’’
‘‘धैर्य, संयम और संतोष तो समय व्यतीत करने का बहाना मात्र है। इनसे हृदय की व्यथा-व्याकुलता दूर नहीं होती।’’ इतना कहकर अनंगपाल फिर गंभीरता के सागर में डूब गए। 

महाराज अनंगपाल को गहन गंभीरता में डूबा देखकर चंद्रसेन ने भी मौन रहना ही उचित समझा।
चंद्रसेन इस वार्तालाप को और बढ़ा़कर महाराज की व्यथा को नहीं बढ़ाना चाहता था। यही सोचकर उसने महाराज के किसी आदेश की प्रतीक्षा करके मौन रहने में ही भलाई समझी।

कक्ष में अभी सन्नाटा ही छाया हुआ था कि इस सन्नाटे को द्वार की थपथपाहट ने एकाएक भंग कर दिया।
द्वार की थपथपाहट एक विशेष अंदाज में हो रही थी। थपथपाहट सुनकर चंद्रसेन अपने आसन से उठ खड़े हुए और फुर्ती से आगे बढ़कर द्वार खोल दिया। 

द्वार पर द्वारपाल के साथ ही एक संदेशवाहक भी खड़ा था। संदेशवाहक ने चंद्रसेन को प्रणाम किया।
‘‘जीवासिंह !’’ संदेशवाहक के प्रणाम का उत्तर देते हुए चंद्रसेन बोला, ‘‘क्या तुम जानते नहीं कि यह महाराज के विश्राम का समय है और विश्राम के समय किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करना महाराज को तनिक भी पसंद नहीं।’’

पृथ्वीराज चौहान
‘‘मंत्री महोदय !’’ संदेशवाहक विनीत स्वर में बोला, ‘‘समाचार ही कुछ ऐसा है, जिसके कारण महाराज को इस समय असमय कष्ट देना पड़ा, इसके लिए मैं अग्रिम ही क्षमायाचना करता हूँ।’’
‘‘ठीक है, कहो, क्या समाचार लाए हो ?’’

‘‘महोदय ! अजमेर राज्य से एक शीघ्रगामी दूत आया है और संभवतः यह देवी कर्पूरी का कोई संदेश लाया है ?’’
‘‘अजमेर राज्य से ?’’
‘‘हां, महोदय !’’

‘‘संदेश किस प्रकार का है ?’’ चंद्रसेन कुछ आशंकित स्वर में बोला, ‘‘कोई शोक संदेश तो नहीं ?’’
‘‘नहीं महोदय !’’ दिल्ली का संदेशवाहक प्रसन्न स्वर में बोला, ‘‘अजमेर के संदेशवाहक के चेहरे पर छाई प्रफुल्लता को देखकर तो ऐसा प्रतीत होता है कि वह अवश्य ही कोई शुभ संदेश लेकर आया है।’’

‘‘तब फिर...।’’ चंद्रसेन आदेशात्मक स्वर में बोला, ‘‘अजमेर के शीघ्रगामी संदेशवाहक को तुरंत महाराज की सेवा में प्रस्तुत करो।’’

‘‘जो आज्ञा मंत्री महोदय !’’ कहकर दिल्ली का संदेशवाहक तेजी से चला गया।
चंद्रसेन द्वार से हटकर अभी मुड़े ही थे कि अजमेर से आया संदेशवाहक द्वार पर आ पहुंचा और धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए महाराज अनंगपाल के निकट पहुंचा। उसने महाराज के सामने शीश झुकाया।

‘‘महाराज ! यह दूत...।’’ चंद्रसेन ने दूत की ओर संकेत करके कहा, ‘‘अजमेर राज्य से आया है।’’
‘‘कहो दूत !’’ महाराज अनंगपाल बोले, ‘‘अजमेर से क्या संदेशा लाए हो ?’’
‘‘महाराज की जय हो कृपानिधान !’’ संदेशवाहक बोला, ‘‘अजमेर राज्य में सब कुशल-मंगल से हैं और महाराज सोमेश्वर एवं महारानी कर्पूरी देवी आपकी कुशलता की मंगल कामना करते हैं।’’
‘हूंऽऽऽ !’’ महाराज अनंगपाल ने लंबा हुंकारा भरा।

पृथ्वीराज चौहान
‘‘इसके अलावा महाराज और महारानी ने अजमेर से आपके लिए शुभ संदेश भेजा है।’’
‘‘कहो संदेशवाहक ! वही शुभ संदेश सुनने के लिए तो हमारे कान प्रतीक्षारत हैं...तुरंत कहो शुभ संदेश क्या है ?’’
‘‘महाराज ! आपकी प्रिय सुपुत्री और अजमेर राज्य की महारानी कर्पूरी देवी ने एक नन्हें सुकुमार को जन्म दिया है।’’
‘‘क्याऽऽऽ !’’ अनंगपाल अपने आसन पर बैठे हुए ही उछल पड़े, ‘‘मेरी बेटी कर्पूरी ने एक बालक को जन्म दिया है ?’’
‘‘हां महाराज ! हां !!’’

‘‘चंद्रसेन !’’ महाराज अनंगपाल प्रसन्नता से चीख उठे, ‘‘तुम सुन रहे हो न !’’
‘‘हां महाराज ! मैं अच्छी तरह सुन रहा हूं कि देवी कर्पूरी ने एक बालक को जन्म दिया है और यह शुभ समाचार सुनकर मैं अति प्रसन्न हूँ’’

‘‘प्रसन्न तो हम भी बहुत अधिक हैं चंद्रसेन ! और कुछ यह शुभ समाचार ही ऐसा है ।’’ महाराज अनंगपाल गद्गद स्वर में बोले, ‘‘संदेशवाहक ! तुमने हमारा मन प्रसन्न कर दिया। अब हम भी तुम्हें प्रसन्न कर देंगे।’’ इतना कहकर अनंगपाल ने अपने कंठ में पहनी हुई सच्चे दुर्लभ मोतियों की बहुमूल्य माला निकालकर संदेशवाहक के गले में डाल दी। 

प्रसन्न होकर संदेशवाहक ने महाराज की जय-जयकार की और फिर महाराज की आज्ञा से वह विश्राम करने चला गया।

‘‘चंद्रसेन !’’ अब महाराज चंद्रसेन की ओर देखते हुए बोले, ‘‘राज्य भर को सजाओ और खूब खुशियां मनाओ। कल का दिन दिल्ली राज्य के लिए एक यादगार उत्सव के रूप में मनाया जाना चाहिए।’’

‘‘जैसी आज्ञा महाराज !’’ चंद्रसेन ने शीश झुकाकर कहा।
महाराज अनंगपाल के अंग-प्रत्यंग से मानो प्रसन्नता की धाराएं फूट पड़ी हों।
दिल्लीपति अनंगपाल प्रसन्न होते भी क्यों नहीं, उनकी इकलौती प्रिय पुत्री कर्पूरी देवी ने एक पुत्र-रत्न को जन्म देकर एक साथ ही अजमेर और दिल्ली को प्रसन्नता से भर दिया था।

अजमेर के राजा सोमेश्वर और रानी कर्पूरी देवी के यहां 1116 ई. में जन्मे इस बालक का नाम रखा गया पृथ्वीराज ! वे चौहान वंश के क्षत्रिय वीर थे। अतः अपने वंश के नाम पर आगे चलकर यह बालक पृथ्वीराज चौहान के नाम से जाना गया।

पृथ्वीराज चौहान के नाना दिल्लीपति महाराज अनंगपाल के यहां कोई पुत्र न था। अतः आगे चलकर महाराज अनंगपाल ने पृथ्वीराज चौहान को ही अपना उत्तराधिकारी घोषित करने का निर्णय किया।


दिल्ली का उत्तरदायित्व

पृथ्वीराज चौहान
सन् 1174 की बात है। बालक पृथ्वीराज चौहान अपनी माता महारानी कर्पूरी देवी के साथ अपने नाना अनंगपाल के यहां दिल्ली आया हुआ था। दिल्लीपति महाराज अनंगपाल पृथ्वीराज की बाल-क्रीड़ाएं देख-देखकर बड़े प्रसन्न हो रहे थे। अब अपना पुत्र न होने का उनका कष्ट काफी हद तक दूर हो गया था।

महाराज अनंगपाल के मन में बसी वर्षों की साध अब खुलकर सामने आने को आतुर हो गई थी। इस बारे में उन्होंने अपने विश्वस्त सलाहकार चंद्रसेन से बात की।

‘‘चंद्रसेन ! आज हम तुम्हारे सामने अपने हृदय का वह राज खोल देना चाहते हैं, जिसे एक लंबे समय से हम अपने सीने में छिपाए फिरते हैं।’’

‘‘महाराज ! यह तो मेरा अहोभाग्य है कि मुझ जैसे तुच्छ नौकर को आपने अपने विश्वास के योग्य समझा।’’ चंद्रसेन विनीत भाव से बोला, ‘‘आपका राज यदि किसी के सामने प्रकट करने के योग्य नहीं है, तो वह मेरे सीने में भी ‘राज’ की तरह छुपा रहेगा।’’

‘‘चंद्रसेन ! कोई भी ‘राज’ हमेशा के लिए राज रहकर सुख नहीं दे सकता। उचित समय आने पर उसे खोल देने से बड़ी खुशी मिलती है।’’

‘‘आप ठीक ही कहते हैं महाराज !’’
‘‘और चंद्रसेन ! आज हम उस राज को खोल देने की बात कर रहे हैं, जिसके खुलने का अब सही समय आ गया है और जो हमें ही नहीं बल्कि दिल्ली राज्य की पूरी प्रजा को भी इसके खुल जाने से सुख मिलेगा।’’-

‘‘ऐसा कौन-सा राज है महाराज ?’’ चंद्रसेन की उत्कंठा बढ़ती ही जा रही थी, ‘‘कृपा करके उसे बताने में शीघ्रता कीजिए।’’

‘‘चंद्रसेन ! यह तो तुम जानते ही हो कि दिल्ली-सिंहासन के उत्तराधिकारी का अभाव हमें हर पल सताता रहता था।

‘‘जी, महाराज !’’
‘‘लेकिन समय के मरहम ने हमारे हृदय की व्याकुलता को कम कर दिया है चंद्रसेन !’’ महाराज अनंगपाल स्थिर स्वर में बोले, ‘‘यही नहीं, बल्कि दिल्ली-सिंहासन के उत्तराधिकारी की समस्या का समाधान भी हमें होता हुआ प्रतीत हो रहा है।’’

‘‘कैसे महाराज ?’’
‘‘कर्पूरी बेटी के पुत्र के बारे में तुम्हारे कैसे विचार हैं ?’’ 
‘‘राजकुमार पृथ्वीराज के बारे में ?’’ चंद्रसेन महाराज अनंगपाल द्वारा विषय से हटकर किए गए प्रश्न को सुनकर कुछ हड़बड़ा गया था।

‘‘हां-हां, राजकुमार पृथ्वीराज के बारे में ही !’’
‘‘राजकुमार पृथ्वीराज एक योग्य और होनहार बालक प्रतीत होते हैं महाराज !’’
‘‘तो पृथ्वीराज के हाथों में दिल्ली राज्य का नियंत्रण कैसा रहेगा चंद्रसेन ?’’
‘‘महाराज ! कहीं आपका तात्पर्य राजकुमार पृथ्वीराज को अपना उत्तराधिकारी बनाने का तो नहीं है ?’’
‘‘हम कुछ ऐसा ही सोच रहे हैं चंद्रसेन !’’ महाराज अनंगपाल विचारपूर्ण स्वर में बोले, ‘‘कहो, यदि ऐसा हो जाए तो कैसा रहेगा ?’’

‘‘आपका ऐसा सोचना अत्युत्तम है महाराज ! किंतु इस प्रकार का कोई भी कदम उठाने से पूर्व कर्पूरी देवी से भी विचार-विमर्श कर लेना चाहिए।’’

‘‘कर्पूरी हमारी बेटी है। हम जैसा चाहेंगे, वह उसी प्रकार हमारा समर्थन कर देगी, ऐसा हमारा विश्वास है।’’
‘‘आपका विश्वास उचित है महाराज ! किंतु हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि देवी कर्पूरी अपने कर्तव्य और धर्म के साथ किसी औ़र से भी जुड़ी हुई हैं। अतः उनके कर्तव्य और उनकी भावनाओं का भी सम्मान करना हमारे लिए अति आवश्यक है महाराज !’’

‘‘तुम ठीक कह रहे हो चंद्रसेन ! इस दिशा में तो हमने कभी सोचा ही नहीं था।’’ महाराज अनंगपाल गंभीर स्वर में बोले, ‘‘कर्पूरी की भी कुछ अपनी भावनाएं होंगी और उससे भी अधिक उन पर कर्पूरी के पति अजमेर के राजा सोमेश्वर का अधिकार है। उनकी आज्ञा के बिना इस प्रकार का कदम उठाना उचित न होगा।’’

पृथ्वीराज चौहान‘‘आप ठीक कह रहे हैं महाराज !’’ चंद्रसेन धीरे से बोला, ‘‘जैसा आप कह रहे हैं ऐसा करना उचित है, तथापि मेरा विचार यह है कि देवी कर्पूरी और अजमेर के राजा सोमेश्वर आपका बड़ा मान-सम्मान करते हैं। वे आपकी किसी भी बात को टालेंगे नहीं।’’

‘‘हम भी कुछ ऐसा ही सोचते हैं चंद्रसेन ! मगर फिर भी हम कर्पूरी से ही पहले बात करेंगे।’’
और फिर उसी दिन संध्या-वंदन के बाद महाराज अनंगपाल ने अपनी बेटी कर्पूरी देवी से बात करने का निर्णय लिया। इस विषय को वे लंबे समय तक टालने के पक्ष में न थे। कुछ विचार करते हुए महाराज अनंगपाल ने एक दासी को भेजकर कर्पूरी देवी को बुला लाने का आदेश दिया।

दासी कुछ ही देर में कर्पूरी देवी को अपने साथ ले महाराज अनंगपाल के कक्ष में आ गई। बालक राजकुमार पृथ्वीराज दासी की गोद में था। कक्ष में प्रवेश करते ही कर्पूरी देवी ने दासी से पृथ्वीराज को ले लिया और उसे बाहर जाने का संकेत किया।

कर्पूरी देवी का संकेत पाकर दासी चुपचाप कक्ष से बाहर निकल गई।
अब कर्पूरी देवी महाराज अनंगपाल की ओर उन्मुख हुई, ‘‘पिताश्री ! आपने मुझे याद किया।’’
‘‘हां बेटी !’’ महाराज अनंगपाल शैया पर करवट बदलकर द्वार की ओर से आती अपनी पुत्री कर्पूरी देवी पर दृष्टिपात करते हुए बोले।

‘‘पिताश्री !’’ कर्पूरी देवी तेज नजरों से महाराज की ओर देखती हुई बोली, ‘‘आप कुछ व्यग्र से दिखाई पड़ रहे हैं। आपका स्वास्थ्य तो ठीक है न ?’’

‘‘हां बेटी ! हमारा स्वास्थ्य तो बिलकुल ठीक है।’’ हंसते हुए महाराज अनंगपाल बोले, ‘‘संध्या वंदन के बाद शैया पर लेट जाने वालों का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता क्या ?’’
‘‘पिताश्री ! मेरा आशय यह नहीं है।’’
‘‘तो फिर क्या है हमारी प्रिय पुत्री का आशय ?’’

पिताश्री ! वास्तव में आप मुझे कुछ व्यग्र-से दिखाई दिए थे। इसी कारण मुझे लगा कि कहीं आपका स्वास्थ्य कुछ....।’’ कर्पूरी देवी ने अपना वाक्य बीच में अधूरा छोड़ दिया।

‘‘बेटी ! हम जानते हैं कि तुम्हें हमारी हर समय चिंता लगी रहती है। हमारा शरीर हल्का-सा गरम हुआ नहीं और तुम बेचैन हो उठती हो कि ज्वर दाह ने हमें पकड़ लिया है। कभी हमें देर रात गए तक नींद न आए तो तुम न जाने कितनी-कितनी बार हमारे कक्ष में आ-आकर देखती हो कि हम अभी तक सोए या नहीं और यदि नहीं सोए तो क्या कारण है...हम किस चिंता में डूबे हुए हैं ? हमें कौन-सा तनाव या कौन-सा दुख व्याकुल कर रहा है ?’’ कहते-कहते महाराज अनंगपाल का स्वर कुछ भारी हो उठा, ‘‘तुम बचपन से लेकर युवा हो गईं मगर तुम्हारे इस स्वभाव में तनिक भी परिवर्तन नहीं आया। अब विवाह के बाद तुम दिल्ली से अजमेर चली गईं....राजकुमार पृथ्वीराज की माता भी बन गईं मगर...मगर मेरी बेटी का स्वभाव इतनी परिस्थितियां बदल जाने के बाद भी ज्यों-का-त्यों ही है।’’

‘‘‘पिताश्री !’’ कर्पूरी देवी भी भावुक हो अपने पिता के निकट शैया पर ही बैठती हुई बोली, ‘‘आप मेरे जन्मदाता हैं...पिता हैं। मैं आपकी बेटी हूं...आपकी प्रिय पुत्री हूं। चंद बरस बीत जाने की तो बात ही क्या ! सदियां बीत जाने पर भी क्या हमारा पिता-पुत्री का संबंध बदल सकता है पिताश्री ?’’

‘‘बेटी ! तुम भी दार्शनिकों के गहन गंभीरता वाले विषय को ले बैठीं। चलो, छोड़ो इसे।’’
‘‘नहीं पिताश्री ! पहले आप यह बताइए कि क्या किसी प्रकार, किसी भी दशा में हमारा रिश्ता बदल सकता है या नहीं ?’’

‘‘बेटी ! परमपिता परमात्मा ने जो रिश्ता प्राणी-जगत में एक बार किसी को दे दिया, वह उस नाम, वंश, योनि और काल के लिए युगों-युगों तक स्थायी हो जाता है। रिश्तों की परिवर्तनशीलता केवल तभी संभव है, जब परमात्मा पुनर्जन्म के बाद उन्हीं प्राणियों को फिर एक दूसरे से जोड़ दे। इतना होने पर भी पूर्वजन्म के रिश्तों का उल्लेख सदा-सदा के लिए स्थायी हो जाता है। जब ऐसा है तो तुम स्वयं विचार करो कि हमारा पिता-पुत्री का परमात्मा द्वारा बनाया गया रिश्ता भला कैसे बदल सकता है।’’

‘‘नहीं बदल सकता न !’’ कर्पूरी देवी अपनी बात पर जोर देते हुए बोली, ‘‘तब पिताश्री ! मैं बाल्यावस्था में रहूं या युवावस्था में, अविवाहित रहूं या विवाहित अथवा आपके पास रहूं या आपसे दूर और भले ही परिस्थितियां कैसी भी हों, आपके प्रति मेरा स्वभाव कभी नहीं बदल सकता आखिरकार आप मेरे पिताश्री हैं और मैं आपकी बेटी जो हूं।’’
‘‘भई मान गए आज हम अपनी बेटी को !’’ महाराज अनंगपाल खुलकर कहकहा लगाते हुए बोले, ‘‘न तो हमारे प्रति हमारी बेटी की चिंता कभी दूर हो सकती है और न हमारी बेटी का स्वभाव बदल सकता है।’’

‘‘अच्छा पिताश्री ! अब मुझे बातों से न बहलाइए।’’ कर्पूरी देवी मूल विषय पर आती हुई बोली, ‘‘और कृपा करके मुझे यह बताइए कि आपकी व्यग्रता का क्या कारण है ?’’

‘‘बेटी ! यह बात हम अच्छी तरह जानते हैं कि जब तक तुम हमें पूरी तरह तनावमुक्त नहीं देख लोगी, तब तक हमारा पीछा नहीं छोड़ने वाली...अतः तुम वह बात सुनो, जिसके कारण हम व्यग्र हैं...अधीर हैं।’’ कहने के साथ ही महाराज अनंगपाल ने अपने कंठ को खंखारकर साफ करने का उपक्रम किया और क्षण-भर के लिए मौन होकर कुछ सोचने लगे।

कर्पूरी देवी की दृष्टि एकटक अपने पिता महाराज अनंगपाल के मुखमंडल पर जमी हुई थी। पितीश्री का मौन उन्हें एक-एक पल के लिए असह्य प्रतीत हो रहा था। जब कई क्षण बीत जाने के बाद भी महाराज अनंगपाल कुछ न बोले तो कर्पूरी देवी ही मौन भंग करती हुई बोली, ‘‘पिताश्री ! आप क्या सोचने लगे ?’’

‘‘उं ऽऽऽ हूं...बेटी !’’ महाराज अनंगपाल ने चौंककर कर्पूरी देवी की ओर देखा और उसकी गोद में किलकारियां मारते हुए बालक राजकुमार पृथ्वीराज की ओर बाहें फैलाकर कहा, ‘‘ला बेटी ! पृथ्वी को हमें दे दो।’’
कर्पूरी देवी ने बिना कुछ कहे ही पृथ्वीराज को अपने पिता की फैली हुई बाहों में थमा दिया।

राजरकुमार पृथ्वीराज को गोद में लेते ही महाराज अनंगपाल के मुख पर छाई हुई व्यग्रता काफी हद तक कम हो गई। उन्होंने पृथ्वीराज को अपने सीने से लगाकर धीरे से भींच लिया। ऐसा करने पर जैसे महाराज अनंगपाल को गहरा आत्मिक सुख मिला और इसी सुख के कारण उनकी पलकें मुंदती चली गईं।

Saturday, December 3, 2016

राणा संग्रामसिंह (साँगा)

देख खानवा यहाँ चढ़ी थी राजपूत की त्यौरियाँ । 
मतवालों की शमसीरों से निकली थी चिनगारियाँ ।


Maharana Sanga
राणा संग्रामसिंह इतिहास में राणा साँगा के नाम से प्रसिद्ध है। राणा साँगा राणा कुम्भा का पोत्र व राणा रायमल का पुत्र था। इनका जन्म वि.सं. १५३९ वैशाख बदी नवमी (ई.स. १४८२ अप्रेल २२) को हुआ था। मेवाड़ के ही नहीं, सम्पूर्ण भारत के इतिहास में राणा साँगा का विशिष्ट स्थान है। इसके राज्यकाल में मेवाड़ अपने गौरव और वैभव के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचा। कुंवर पदे में इनका अपने बड़े भाई पृथ्वीराज (उड़णा राजकुमार) से विवाद हो गया था। उसी विवाद में इनकी एक आँख फूट गई थी, इस आपसी झगड़े के समय विश्वस्त सरदारों ने राणा साँगा को बचा लिया। प्रारम्भिक काल में (अपने पिता के समय) काफी दिनों तक अज्ञात वास में रहे। अपने दोनों बड़े भाइयों की कुंवर पदे ही मृत्यु होने के बाद वह मेवाड़ में पिता के पास आए। पिता की मृत्यु के पश्चात् वि.सं. १५६६ ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी (ई.स. १५०९) को राज्यभिषेक हुआ।

राणा साँगा मेवाड़ के राणाओं में सबसे अधिक प्रतापी था। उस समय का सबसे प्रबल क्षत्रिय राजा था, जिसकी सेवा में अनेक अन्य राजा रहते थे और कई राजा, सरदार तथा मुसलमान अमीर, शहजादे आदि उसकी शरण लेते थे उस समय दिल्ली में लोदी वंश का सुलतान सिकन्दर लोदी, गुजरात में महमूदशाह (बेगड़ा) और मालवा में नासिरशाह खिलजी का राज्य था। राणा साँगा ने अपने बाहुबल पर विशाल साम्राज्य स्थापित किया। ग्वालियर, अजमेर, चन्देरी, बूंदी, गागरौन, रामपुरा और आबू के राजा उनके सामन्त थे। इसके अलावा राजपूताने के और भी राजा, राणा साँगा की सहायता के लिए हमेशा तैयार रहते थे। राणा साँगा का पूरा जीवन, बचपन से लेकर मृत्युपर्यन्त युद्धों में बीता। गुजरात के सुलतान ने इंडर के स्वामी रायमल राठौड़ को हटाकर ईडर पर कब्जा कर लिया। राणा साँगा रायमल की सहायता के लिए गया। सुलतान निजामुल्मुल्क को युद्ध में हराया। ईडर पर रायमल का अधिकार करवा दिया। सुल्तान ईडर से भागकर अहमदनगर चला गया। मुसलमानों ने किले के दरवाजे बन्द कर लिए। सीसोदिया सेना ने दुर्ग को घेर लिया हाथी की टक्कर दिलाकर दुर्ग के कपाट तोड़ दिए गए। दोनों सेनाओं में भीषण संग्राम हुआ। मुस्लिम सेना की हार हुई, सुलतान पीछे के दरवाजे से निकलकर भाग गया | दिल्ली के सुलतान इब्राहिम लोदी ने वि.सं. १५७४ में (ई.स. १५१७) मेवाड़ पर चढ़ाई की। सुलतान विशाल सेना लेकर खातोली (हाड़ौती क्षेत्र) नामक स्थान पर आया। यहाँ दोनों सेनाओं का मुकाबला हुआ। सुलतान इब्राहिम लोदी की पराजय हुई। सुलतान अपनी सेना सहित भाग निकला और उसका एक शहजादा कैद हुआ, जिसे कुछ समय बाद राणा ने दण्ड लेकर छोड़ दिया।

Maharana Sanga
माण्डू के सुल्तान महमूद ने वि.सं. १५७६ (ई. स. १५१९) में गागरौन पर चढ़ाई की, इस युद्ध में राणा साँगा अपनी सेना के साथ गागरौन के राजा की सहायता हेतु आया। दोनों सेनाओं में भीषण युद्ध हुआ। इस युद्ध में मुस्लिम सेना पराजित हुई। सुल्तान स्वयं घायल हो गया, राणा ने उसे अपने तम्बू में पहुँचवाया और उसके घावों का इलाज करवाया। उसे चित्तौड़ में तीन महीने कैद रखा और फौज खर्च लेकर उसे क्षमा कर दिया। सुल्तान ने अधीनता चिह्न स्वरूप राणा को रत्नजड़ित मुकुट तथा सोने की रत्न जड़ित कमर पेटी भेंट की। राणा साँगा ने दिल्ली, गुजरात के मुहम्मद बेगड़ा और मालवा के नासीरुद्दीन की सम्मिलित सेना से युद्ध किया, फिर भी जीत राणा की हुई।

बाबर ने पानीपत के मैदान में दिल्ली के लोदी सुल्तान को परास्त करके दिल्ली पर मुगल सल्तनत की स्थापना कर ली थी। उसके पड़ोस में मेवाड़ एक शक्तिशाली साम्राज्य था अतः दोनों के मध्य युद्ध होना आवश्यक हो गया। दोनों सेनाएँ खानवा (फतेहपुर सीकरी) स्थान पर युद्ध के लिए रवाना हुई। राणा साँगा की राज्य सीमा बयाना तक थी। बाबर ने बयाना पर आक्रमण कर, उसे अपने अधिकार में कर लिया। राणा अपनी सेना लेकर बयाना की तरफ बढ़ा, बयाना पर आसानी से कब्जा कर लिया। दोनों के मध्य कई छोटी-मोटी लड़ाइयाँ हुई, जिनमें राणा साँगा की विजय हुई। बाबर की बराबर हार हो रही थी, वह बड़ा निराश था। उसने निर्णायक युद्ध के लिए फतेहपुर सीकरी के पास खानवा नामक स्थान पर अपनी सेना का पड़ाव डाला। राणा साँगा की सेना में राजपूताने के सभी राजा अपनी-अपनी सेनाओं के साथ सम्मिलित थे। राणा साँगा के साथ महमूद लोदी (इब्राहिम लोदी का पुत्र), राव गाँगा जोधपुर, पृथ्वीराज कछावा आमेर, भारमल ईंडर, वीरमदेव मेड़तिया, रावळ उदयसिंह डूंगरपुर, नरबद हाड़ा बूंदी, मेदनीराय चन्देरी, रावत बाघसिंह देवळिया, कुं, कल्याणमल बीकानेर, (राव जैतसी का पुत्र) हसन खाँ मेवाती अपनी-अपनी सेनाओं के साथ थे।

Maharana Sanga
वि.सं. १५८४ चैत्र सुदि ११ (ई.स. १५२७ मार्च) को दोनों सेनाएँ आमनेसामने हुई। प्रारम्भिक लड़ाइयों में बाबर की पराजय हुई। मुस्लिम सेना में घोर निराशा फैल गई। बाबर ने अपनी सेना में जोश लाने के लिए एक जोशीला भाषण दिया। अपनी सेना की रणनीति बनाई। बाबर के पास बड़ी-बड़ी तोपें थी, उनकी मोचबिन्दी की। वि.सं. १५८४ चैत्र सुदि १४ को (ई.स. १५२७ मार्च १७) दोनों सेनाओं में भयंकर युद्ध हुआ। बाबर ने तोपखाने का प्रयोग किया। इससे पहले भारत में तोपों का प्रयोग नहीं होता था। तोपों से बहुत से राजपूत मारे गए, लेकिन उनके उत्साह में कोई कमी नहीं आई। मुगल सेना का पलड़ा हल्का था, वे हार रहे थे। मुगल सेना भी पूरे जोश से युद्ध कर रही थी। इतने में एक तीर राणा साँगा के सिर में लगा, जिससे वे मुर्छित हो गए और कुछ सरदार उन्हें पालकी में बैठा कर युद्ध क्षेत्र के बाहर सुरक्षित जगह पर ले गए। राणा के हटते ही झाला अञ्जा ने राजचिह्न धारण करके राणा साँगा के हाथी पर सवार होकर युद्ध का संचालन किया । झाला अज्रा की अध्यक्षता में सेना लड़ने लगी। लेकिन राणा साँगा की अनुपस्थिति में सेना में निराशा छा गई। राजपूत पक्ष अब भी मजबूत था। तोपखाने ने भयंकर तबाही मचाई, इसी समय बाबर के सुरक्षित दस्ते ने पूरे जोश के साथ में पराजय हुई। राणा साँगा को बसवा नामक स्थान पर लाया गया। 

Maharana Sanga
जब उसे होश आया तो वह दुबारा युद्ध करना चाहता था। बसवा से राणा साँगा रणथम्भौर चला गया। वह बाबर से दुबारा युद्ध करना चाहता था। इसी बीच किसी सरदार ने उन्हें विष दे दिया जिससे राणा साँगा का ४६ वर्ष की आयु में स्वर्गवास हो गया। राणा साँगा का माघ सुदि नवमी वि.सं. १५८४ (ई.स. १५२८ जनवरी ३०) को कालपी के पास एरिच में स्वर्गवास हुआ और माण्डलगढ़ में दाह संस्कार हुआ (अमर काव्य)। वीर विनोद में बसवा स्थान बताया गया है। बसवा में एक प्राचीन चबूतरा बना हुआ है। यहाँ के लोगों की मान्यता है कि यह चबूतरा राणा साँगा का स्मारक है। मेवाड़ वाले भी इसे ही राणा साँगा का स्मारक मानते हैं। अमर काव्य राणा साँगा की मृत्यु के लगभग सौ वर्ष बाद की रचना है। अत: यही सम्भव है कि राणा साँगा का दाह संस्कार बसवा में ही हुआ होगा। इस पराजय से राजपूतों का वह प्रताप, जो राणा कुम्भा के समय में बहुत बढ़ा और इस समय अपने शिखर पर पहुँच चुका था, वह एकदम कम हो गया। इस युद्ध में राजस्थान के सभी राजपरिवारों के कोई-न-कोई प्रसिद्ध व्यक्ति काम आए। भारत पर मुगल सत्ता स्थापित हो गई, राजपूतों की एकता टूट गई। राजस्थान की सदियों पुरानी स्वतन्त्रता तथा उसकी प्राचीन संस्कृति को सफलतापूर्वक अक्षुण्ण बनाए रखने वाला अब कोई भी नहीं रहा। 

‘‘राणा साँगा के साथ ही साथ भारत के राजनीतिक रंगमंच पर हिन्दू साम्राज्य का अन्तिम दृश्य भी पूर्ण हो गया।’ इतिहास उसे भारतीय अन्तिम हिन्दू
सम्राट के रूप में स्मरण करता है।

बाबर तेरे प्याले टूटे बता कितने ? 
पर सरहद्दी का अफसोस लिए फिरते हैं।


Maharana Sanga
सरहदी :- सरहदी तेंवर राणा साँगा का दामाद था। कई इतिहासकारों ने उल्लेख किया है कि ऐन लड़ाई के वक्त तेंवर सरहदी, जो राणा साँगा के हरावल में था, राजपूतों को धोखा देकर अपने सारे सैन्य सहित बाबर से जा मिला। यह तथ्य गलत है। खानवा युद्ध से पहले बाबर की सेनाएँ लगातार हार रही थी अतः बाबर ने राणा साँगा के पास सन्धि का प्रस्ताव भेजा, जिसे राणा साँगा ने स्वीकार कर लिया था। राणा साँगा ने सरहदी को सन्धि की शर्ते लिखकर दी। बाबर ने उन सारी शतों को स्वीकार कर लिया क्योंकि युद्ध में राजपूतों का पलड़ा भारी चल रहा था |

खानवा युद्ध से पहले युद्ध में राजपूतों का पलड़ा भारी था अतः राणा साँगा ने सन्धि करने से इन्कार कर दिया। इससे सरहदी की स्थिति असमंजसपूर्ण हो। गई। उसने राणा साँगा को समझाने के बहुत प्रयत्न किए लेकिन साँगा ने सन्धि स्वीकार नहीं की। इस घटनाक्रम से सरहदी ने अपने आप को अपमानित अनुभव किया तथा वह अपनी सेना के साथ वापस अपने प्रदेश में चला गया।

Tuesday, November 22, 2016

महाराणा कुंभा

महाराणा कुंभा
महाराणा कुंभा राजस्थान के शासकों में सर्वश्रेष्ठ थे। मेवाड़ के आसपास जो उद्धत राज्य थे, उन पर उन्होंने अपना आधिपत्य स्थापित किया। 35 वर्ष की अल्पायु में उनके द्वारा बनवाए गए बत्तीस दुर्गों में चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, अचलगढ़ जहां सशक्त स्थापत्य में शीर्षस्थ हैं वहीं इन पर्वत-दुर्गों में चमत्कृत करने वाले देव भवन भी हैं। उनकी विजयों का गुणगान करता विश्वविख्यात कीर्ति (विजय) स्तंभ राष्ट्र की अमूल्य धरोहर है। लेखक ने कुंभा के इतिहास को केवल युद्धों की विजय तक सीमित नहीं किया बल्कि बहुत विस्तार से महाराणा की शक्ति और संगठन क्षमता के साथ-साथ उनकी रचनात्मकता का विशद परिचय भी दिया है। ‘संगीत राज’ उनकी महान रचना है जिसे साहित्य का कीर्ति स्तंभ माना जाता है। 

13 जून, 1822 को सूर्योदय के पहले छः बजे जेम्स टॉड जब अग्नि कुंड से अचलगढ़ पर चढ़ा, अतीत उसके सामने साक्षात हो गया : ‘‘टूटी-फूटी छतरियां हमारे चारों ओर घिरे हुए बादलों में डूबी हुई थीं।’’ ‘‘किसी जमाने के राजकीय आवास में जब उसके हनुमान दरवाजे से प्रवेश किया,’’ ‘‘टूटी-फूटी दीवारें इस विषम चढ़ाई में कहीं-कहीं दिखाई दीं।’’ यहाँ उसे राणा कुंभा की याद आई : ‘‘यहीं अनाज के वे भी कोठे हैं जो कुंभाराणा के भंडार कहलाते हैं, इनके भीतर की तरफ बहुत मजबूत सीमेंट पुता हुआ है, परंतु छत गिर गई है। पास ही, बाईं तरफ उनकी रानी का महल है, जो हिंदुओं के जगत कूंट ‘ओक मंडल’ (आख्या) मंडल की होने के कारण ‘ओका राणी’ कहलाती थी। दुर्ग में एक छोटी-सी झील भी है जिसको सावन-भादों कहते हैं, जून मास के मध्य में भी पानी से भरी रहने के कारण यह पावस के इन दोनों प्रमुख महीनों के नाम को सार्थक करती है। पूर्व की ओर सबसे ऊंची टेकरी पर परमारों की भय-सूचिका बुर्ज (अलार्म टावर) के खंडहर हैं, जो अब तक कुंभा राणा के नाम से प्रसिद्ध हैं, यहां से तेज दौड़ने वाले बादलों को यदा-कदा चीरती हुई दृष्टि उस वीर जाति की बलि वेदी और महलों पर पड़ती है जिसने उस स्थल पर, जहां से मैंने निरीक्षण किया था, आत्मरक्षा के लिए अपना खून बहाया था। सम्मिश्रण सम्मोहित करता है सुंदरताओं, जल प्रवाहों और कंदराओं का, फल, पल्लव, पाषाण खंड, वनस्थली, अन्नदाता खेत, शेल शिखर, अंगूरी वल्लारी, और अधिपतिहीन दुर्ग, जो निर्ममता से विदाई स्फुरित करते हैं, वहां से जहां पुरानी पड़ी दीवारें पत्तों से भरी हैं, जहां विनाश प्राणवाण होकर प्रस्तुत है। 

जेम्स टॉड ने ‘‘हजारों शरदकालीन हवा के निर्मम झोंके खा-खाकर काली पड़ गई ‘‘चट्टानों पर अपने प्रतिभा-प्रसून चढ़ाकर, गद्य को पद्य बनाया है, और पद्य की ज्योति प्रदान की है, परंतु तथ्य उसके समय में इतने उजागर नहीं हुए थे कि सत्य का भी साथ मिल जाता। या यों कहीं चट्टानों पर सूर्य की पहली किरणों की चकाचौंध में वह आ गया, जिससे उसकी कलम से निकल गया : ‘‘अचलगढ़ के किले को राणा कुंभा ने बनवाया था’’ यहाँ तक वह सही है, लेकिन इसके आगे के शब्द इतिहास स्वीकार नहीं करता : ‘‘जब उसको मेवाड़ के ‘चौरासी किलों’ से निकाल दिया गया था।’’ अचलगढ़ का निर्माता कुंभा अपने बनवाए किलों से कभी निकाला नहीं गया, उनसे सेना लेकर उसने आबू का शीर्षस्थ स्थल जीता था, और वहाँ अपनी स्मृति ऐसी सुरक्षित की कि 370 साल बाद भी टॉड को यही कुंभा के लिए कहना पड़ा : ‘‘मेवाड़ के सुयोग्य वीरों के प्रतिनिधि राणा कुंभा,’’ जिनकी अश्वाधिष्ठित पीतल की प्रतिमा को उसने उतराई में ‘‘नमस्कार किया–इस राणा ने इन्हीं दीवारों में बहुत-सी लड़ाइयों में लोहा लिया था।’’ 

टॉड ऊंचाई से उतरा था और पुराने पद उसकी आंखों पर आ रहे थे : ‘‘इन भग्नावशेषों के ढेरों के बीच खड़े होकर किसका मन भारी (दुःखी) न हो जाएगा ? इन गहरे हरे पत्थरों में, जिन पर तुम चल रहे हो, उन टूटी, फूटी चट्टानों के टुकड़ों में, जिन पर घनी जंगली बेलें फैल गईं हैं और जहां कभी झंडा फहराया जाता था, कितने गौरवपूर्ण इतिहास छुपे हैं ? ये अनावृत छत्रविहीन प्रासाद जिनमें आज हम विनीत किंतु आशापूर्ण होकर निकलते हैं और मृतकों एवं जीवित व्यक्तियों के प्रति उदार भाव धारण करते हैं, (हमारी) विचारशील दृष्टि के लिए कितने उत्कृष्ट विषय एवं विचारों के लिए कितने पवित्र आधार उपस्थित कर देते हैं ?’’

Friday, November 4, 2016

वीर राव अमरसिंह राठौड़ और बल्लू चाम्पावत

'राजस्थान की इस धरती पर वीर तो अनेक हुये है - प्रथ्वीराज,महाराणा सांगा,महाराणा प्रताप,दुर्गादास राठौड़, जयमल मेडतिया आदि पर अमर सिंह राठौड़ की वीरता एक विशिष्ट थी,उनमें शौर्य,पराक्रम की पराकाष्ठा के साथ रोमांच के तत्व विधमान थे | उसने अपनी आन-बान के लिए ३१ वर्ष की आयु में ही अपनी इहलीला समाप्त कर ली | 

आत्म-सम्मान की रक्षार्थ मरने की इस घटना को जन-जन का समर्थन मिला| सभी ने अमर सिंह के शौर्य की सराहना की| साहित्यकारों को एक खजाना मिल गया| रचनाधारियों के अलावा कलाकारों ने एक ओर जहाँ कटपुतली का मंचन कर अमर सिंह की जीवन गाथा को जन-जन प्रदर्शित करने का उल्लेखनीय कार्य किया,वहीं दूसरी ओर ख्याल खेलने वालों ने अमर सिंह के जीवन-मूल्यों का अभिनय बड़ी खूबी से किया |रचनाधर्मियों और कलाकारों के संयुक्त प्रयासों से अमरसिंह जन-जन का हृदय सम्राट बन गया |"

अमर सिंह राठौड़ की वीरता सर्वविदित है ये जोधपुर के महाराजा गज सिंह के ज्येष्ठ पुत्र थे जिनका जन्म रानी मनसुख दे की कोख से वि.स.१६७० , १२ दिसम्बर १६१६ को हुआ था | अमर सिंह बचपन से ही बड़े उद्दंड,चंचल,उग्रस्वभाव व अभिमानी थे जिस कारण महाराजा ने इन्हें देश निकाला की आज्ञा दे जोधपुर राज्य के उत्तराधिकार से वंचित कर दिया था| उनकी शिक्षा राजसी वातावरण में होने के फलस्वरूप उनमे उच्चस्तरीय खानदान के सारे गुण विद्यमान थे और उनकी वीरता की कीर्ति चारों और फ़ैल चुकी थी | १९ वर्ष की आयु में ही वे राजस्थान के कई रजा-महाराजाओं की पुत्रियों के साथ विवाह बंधन में बाँध चुके थे |

लाहौर में रहते हुए उनके पिता महाराजा गज सिंह जी ने अमर सिंह को शाही सेना में प्रविष्ट होने के लिए अपने पास बुला लिया अतः वे अपने वीर साथियों के साथ सेना सुसज्जित कर लाहोर पहुंचे | बादशाह शाहजहाँ ने अमर सिंह को ढाई हजारी जात व डेढ़ हजार सवार का मनसब प्रदान किया | अमर सिंह ने शाजहाँ के खिलाफ कई उपद्रवों का सफलता पूर्वक दमन कर कई युधों के अलावा कंधार के सैनिक अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई | बादशाह शाहजहाँ अमर सिंह की वीरता से बेहद प्रभावित था |

६ मई १६३८ को अमर सिंह के पिता महाराजा गज सिंह का निधन हो गया उनकी इच्छानुसार उनके छोटे पुत्र जसवंत सिंह को को जोधपुर राज्य की गद्दी पर बैठाया गया | वहीं अमर सिंह को शाहजहाँ ने राव का खिताब देकर नागौर परगने का राज्य प्रदान किया | 

हाथी की चराई पर बादशाह की और से कर लगता था जो अमर सिंह ने देने से साफ मना कर दिया था | सलावतखां द्वारा जब इसका तकाजा किया गया और इसी सिलसिले में सलावतखां ने अमर सिंह को कुछ उपशब्द बोलने पर स्वाभिमानी अमर सिंह ने बादशाह शाहजहाँ के सामने ही सलावतखां का वध कर दिया और ख़ुद भी मुग़ल सैनिकों के हाथो लड़ता हुआ आगरे के किले में मारा गया | राव अमर सिंह राठौड़ का पार्थिव शव लाने के उद्येश्य से उनका सहयोगी बल्लू चांपावत ने बादशाह से मिलने की इच्छा प्रकट की,कूटनीतिज्ञ बादशाह ने मिलने की अनुमति दे दी,आगरा किले के दरवाजे एक-एक कर खुले और बल्लू चांपावत के प्रवेश के बाद पुनः बंद होते गए | अन्तिम दरवाजे पर स्वयं बादशाह बल्लू के सामने आया और आदर सत्कार पूर्वक बल्लू से मिला| बल्लू चांपावत ने बादशाह से कहा "बादशाह सलामत जो होना था वो हो गया मै तो अपने स्वामी के अन्तिम दर्शन मात्र कर लेना चाहता हूँ|" और बादशाह में उसे अनुमति दे दी | 

इधर राव अमर सिंह के पार्थिव शव को खुले प्रांगण में एक लकड़ी के तख्त पर सैनिक सम्मान के साथ रखकर मुग़ल सैनिक करीब २०-२५ गज की दुरी पर शस्त्र झुकाए खड़े थे | दुर्ग की ऊँची बुर्ज पर शोक सूचक शहनाई बज रही थी | बल्लू चांपावत शोक पूर्ण मुद्रा में धीरे से झुका और पलक झपकते ही अमर सिंह के शव को उठा कर घोडे पर सवार हो ऐड लगा दी और दुर्ग के पट्ठे पर जा चढा और दुसरे क्षण वहां से निचे की और छलांग मार गया मुग़ल सैनिक ये सब देख भौचंके रह गए |

दुर्ग के बाहर प्रतीक्षा में खड़ी ५०० राजपूत योद्धाओं की टुकडी को अमर सिंह का पार्थिव शव सोंप कर बल्लू दुसरे घोडे पर सवार हो दुर्ग के मुख्य द्वार की तरफ रवाना हुआ जहाँ से मुग़ल अस्वारोही अमर सिंह का शव पुनः छिनने के लिए दुर्ग से निकलने वाले थे,बल्लू मुग़ल सैनिकों को रोकने हेतु उनसे बड़ी वीरता के साथ युद्ध करता हुआ मारा गया लेकिन वो मुग़ल सैनिको को रोकने में सफल रहा